बुलंदशहर -( आनन्द शर्मा )-“ सीने में जलन, आंखों में तुफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है ” पुलिसकर्मियों की हालत भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है और यही कडवा सच है ! असमय खान-पान और लगातार ड्यूटी का दबाव पुलिसकर्मियों को चिड़चिड़ा बना देता है,नतीजन फरियादी उनके कोप का शिकार बन जाता है ! सूत्रों से मिली जानकारी को सही मानें तो निर्धारित छुट्टी अवकाश के दिनों में से भी आवश्यकता पडने पर कटोती कर दिए जाने का कुप्रभाव पडता है, हालांकि अवकाश अवधि में ड्यूटी करने का अलग से पैसे दिए जाने का प्रवधान पता चला है लेकिन फिर भी पुलिसकर्मी पर मानसिक दबाव तो पडना स्वाभाविक है ही क्योंकि परिवार से संबंधित भी कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिनको समय पर करना जरूरी होता है !
ड्यूटी का बोझ या गुस्से का विस्फोट?
मिली जानकारी के अनुसार ड्यूटी क्षेत्र में एक सिपाही की भी उतनी ही जिम्मेदारी होती है जितनी एक थाना प्रभारी की क्योंकि ड्यूटी क्षेत्र में घटित घटना के लिए सिपाही के खिलाफ समान तरीके से ही कार्यवाही का होना बताया गया है ! एक सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी के मुताबिक सिपाही की सिर्फ हल्के में शिफ्ट में ड्यूटी होती है जबकि प्रभारी को 24 घंटे क्षेत्र की निगरानी करने का जिम्मा होता है ! यह भी सच ही है कि क्षेत्र में कहीं न कहीं छोटी – बडी घटनाएं घटित होने के कारण भी पुलिसकर्मी उलझे रहते हैं जिससे सोना -उठना,नहाना – धोना एवं खाना भी समय पर नहीं हो पाता है, इतना ही नहीं पास रहने के बाबजूद भी परिजनों को समय नहीं दे पाते हैं, भागम भाग की स्थिति का असर,
फरियादी क्यों बन रहा है गुस्से का शिकार?
अधिकारियों की फटकार का डर, फरियादी की फरियाद लिखना, मुलजिमों को थाना से न्यायालय, न्यायालय से जेल पहुंचाना, क्षेत्र में अपराध घटित होने पर शान्ति कायम रखने के लिए जूझना आदि ऐसे बहुत से कारण हैं कि जिनके कारण पुलिसकर्मी का मन विचलित होना और मस्तिष्क में चिड़चिड़ापन का होना तो बनता है,,अब सोचिए इन परिस्थितियों में कोई फरियादी अपनी शिकायत लेकर पहुंचता है थाने तो न चाहकर भी उसकी मदद शिकायत सुनने की बजाय उसे पुलिस के कोप का शिकार होना पड़ता है,
जिम्मेदारी और संवेदनशीलता दोनों जरूरी
हालांकि ऐसा करना या होना गलत है फिर भी होता तो है ही ! क्योंकि पुलिस की जो जिम्मेदारी है उसे तो पूरा करना उसका दायित्व बनता है ! माना कि काम के दबाव के कारण पुलिसकर्मी में चिड़चिड़ापन होता होगा फिर भी फरियादी यानि पीड़ित की शिकायत दर्ज कर उसको न्याय दिलाना तो उसकी जिम्मेदारी बनती ही है, उससे विमुख होना ही पुलिस को कटघरे में खड़ा कर देती जो उचित नहीं है !








