Hindi News Education:निजी स्कूलों की मनमानी पर क्यों खामोश है सिस्टम? सरकारी आदेश के बावजूद जारी अभिभावकों की लूट

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टांडा, रामपुर | रिपोर्ट: आनन्द शर्मा

“बच्चों का भविष्य संवारने” के नाम पर अगर किसी के सपनों और मेहनत की कमाई का सौदा होने लगे, तो यह सिर्फ एक समस्या नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है। टांडा क्षेत्र में कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है, जहां निजी स्कूलों की मनमानी के आगे सरकारी आदेश भी बेअसर साबित हो रहे हैं।

सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए कई स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है। निजी स्कूल संचालक नियमों को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं, जबकि जिम्मेदार शिक्षा विभाग मूकदर्शक बना हुआ है।

सपनों का सौदा” — अभिभावकों की जेब पर सीधा वार

गांव मुडिया रसूलपुर के भूतपूर्व प्रधान हासिम अली अंसारी का कहना है कि निजी स्कूल बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखाकर अभिभावकों से मनमानी फीस वसूल रहे हैं।

स्कूलों द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का प्रचार बड़े-बड़े दावों के साथ किया जाता है, लेकिन जब हकीकत सामने आती है, तो अधिकांश दावे खोखले साबित होते हैं। अभिभावक, अपने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए, मजबूरी में यह आर्थिक बोझ उठाने को विवश हैं।

NCERT किताबों का नियम सिर्फ कागजों में क्यों?

सरकार ने साफ निर्देश दिए हैं कि स्कूलों में NCERT की किताबें अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाएं, ताकि सभी बच्चों को समान और किफायती शिक्षा मिल सके।

लेकिन टांडा के कई निजी स्कूल इस नियम को नजरअंदाज कर महंगी निजी पब्लिकेशन की किताबें थोप रहे हैं। इससे न सिर्फ अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है, बल्कि शिक्षा में असमानता भी पैदा होती है।

👉 सवाल यह है कि आखिर इन स्कूलों को इतनी छूट कौन दे रहा है?

मान्यता के नाम पर फर्जीवाड़ा, नियमों की खुली अनदेखी

स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब यह सामने आता है कि कई निजी स्कूल मान्यता के लिए जरूरी मानकों को भी पूरा नहीं करते।

न पर्याप्त शिक्षक
न उचित कक्षाएं
न बुनियादी सुविधाएं

इसके बावजूद ये स्कूल खुद को “मान्यता प्राप्त” बताकर धड़ल्ले से चल रहे हैं और अभिभावकों को भ्रमित कर रहे हैं।

बच्चों की सुरक्षा भी दांव पर

स्कूलों द्वारा संचालित वाहनों की स्थिति भी चिंताजनक है। कई वाहन बिना उचित पंजीकरण और सुरक्षा मानकों के सड़कों पर दौड़ रहे हैं।

तिपहिया, जर्जर बसें और अनफिट वाहन बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। पहले भी कई हादसे हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद न तो स्कूल प्रबंधन सतर्क है और न ही प्रशासन सख्ती दिखा रहा है।

शिक्षा विभाग की चुप्पी—लापरवाही या मिलीभगत?

इतनी अनियमितताओं के बावजूद शिक्षा विभाग की निष्क्रियता कई सवाल खड़े करती है।

👉 क्या अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं?
👉 या फिर कहीं न कहीं इस खेल में उनकी भी भूमिका है?

स्थानीय लोगों में इसको लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।

सख्त कार्रवाई की मांग तेज

पूर्व प्रधान हासिम अली अंसारी ने मांग की है कि जो स्कूल सरकारी आदेशों का पालन नहीं कर रहे, उनकी मान्यता तत्काल रद्द की जाए। साथ ही, दोषी स्कूल संचालकों और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

उनका मानना है कि जब तक जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इस तरह की लापरवाही और शोषण जारी रहेगा।

क्या सरकार लेगी कड़ा फैसला?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेकर ठोस कदम उठाएगी, या फिर अभिभावकों की मेहनत की कमाई यूं ही लुटती रहेगी?

अगर समय रहते इस पर सख्ती नहीं की गई, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ेगा।

 

 

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